आओ तुमको लेकर चलूँ
जहाँ भूख है, लाचारी है
गरीबी है और उन्हें ख़त्म करने के
झूठ मूठ के वादे हैं
जहाँ बंद किसी कमरे में
कर्जा ना चुका पाने पर
मुर्दा किसानों की
पंखे से लटकी लाशें हैं
जहाँ हर पल ही
पाँव फैलाती
ढेर सारी बीमारी हैं
जहाँ बाढ़ है, सूखा है
और उस पर दिया हुआ
राहत पैकेज है
जहाँ जात-पात और धर्म की
झूठी शिक्षा देने वाले लोग हैं
जहाँ मंदिर बनाने के लिए
चन्दा इकठ्ठा किया जाता है
पर एक अदद स्कूल का
नाम तक जुबान पर नहीं आता
जहाँ क़र्ज़ है
और उस पर भी लगता
साहूकारों का ब्याज है
जहाँ पानी की प्यास है
और उस पर दूर से
आती दिखती
मौत की आस है
आओ तुम्हे लेकर चलूँ ...
तब शायद
ये बात दूर तक जाये
